गीतकार पंडित विद्याभूषण मिश्र

गीतकार पंडित विद्याभूषण मिश्र

 

 

-प्रो. अश्विनी केशरवानी

 

कवि श्री राम अधीर का कथन है-''साहित्य के विशाल और विविधरंगी परिदृश्य पर गीत का उदय मनुष्य के जन्म के साथ ही हुआ है। गीत वास्तव में लय और रागात्मकता का समुच्चय है। यह विश्व की हर भाषा में गाया और कहा गया है। गीत की विविध परिभाषाएं दी गई हैं लेकिन जिस हिन्दी गीत की मैं चर्चा कर रहा हूं वह अपने मूल चरित्र में काफी भिन्न है। कहा जाता है कि जब यूरोपीय देशों के सर्वहारा वर्ग के लोग अपने श्रम का परिहार करते थे तो नाचते गाते हुए कुछ बोल उनके अधरों पर फूट पड़ते थे। यह बोल वे जिस वाद्य पर गाते थे उसे 'लायर' कहा जाता था और इसी लायर से ही 'लिरिक' का जन्म हुआ जिसे कालान्तर में 'गीत' कहा गया परन्तु हिन्दी का गीत किसी स्तर पर लिरिक नहीं है और इसका कारण है हिन्दी गीत की मूल चेतना और संवेदना का शुद्ध भारतीय होना। क्रौंच वध से उपजी कविता ने आदि कवि को अगर काव्यानंद प्रदान किया तो आज का गीत भी वही कर रहा है जो परंपरागत है और आज भी नव्यता उसमें विद्यमान है। रस गंगाधर ग्रंथ में पंडितराज जगन्नाथ ने कहा है-'रमणीयार्थ प्रतिपादक शद्व काव्यं।' बात यहीं समाप्त नहीं होती। कहा गया है कि -रसस्य परिपंथित्वान्नालंका: प्रहेलिका' कविता का गुण प्रसाद और चमत्कार या प्रभावशीलता है। जिस काव्य में जितना चमत्कार होगा वह उतना ही उत्कृष्ट और आदरणीय होगा।''

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के युग से ही हिन्दी गीत का जन्म हो गया था और बाद में उसने छायावाद, रहस्यवाद और प्रगतिवाद का युग भी देखा। इसलिए गीत अपने नए पुराने कलेवर में आज भी अपनी जीवंतता दर्ज कराता आ रहा है। जब गीत पंत-प्रसाद-निराला के युग में आया तो उसकी अंतरधाराएं कुछ बदलीं। कहना न होगा कि उस युग का गीत अंतर्मुखी अधिक था। तत्कालीन गीत धर्मियों ने इसे जिस तरह से गाया था वह उनकी अपनी वेदना संवेदना का गीत था, लेकिन उनकी धाराएं अलग थीं जैसे कि पंत जी ने गीत को प्रकृतिमय बना दिया था परन्तु उनका प्रकृति को गाना अपने को गाना था और इस तरह वह वाह्य जीवन से सीधा सरोकार कायम करते रहे। छायावादी युग से अपनी यात्रा को नये पड़ाव और मुकामों तक लाने वाला गीत अब उत्तर छायावादी युग तक आया तो उसका कायापलट ही हो गया था और तब बच्चन और नरेन्द्र शर्मा जैसे गीतकारों ने गीत को सार्वजनीन बना दिया था। इनमें अंचल जी का नाम भी आस्था से लिया जाता है। वे उत्तर छायावाद के समर्थ गीत शिल्पी थे।

 

अपने मूल चरित्र में आज गीत केवल गीत ही के नाम से पहचाना जाता है जबकि परंपरावादी गीत से हटकर नवगीत का जन्म हुआ है। गीत चाहे पारंपरिक हो या नवगीत, उसमें वही ध्वनित हो रहा है जिसकी आज जरूरत है। गीत कालजयी और काल सापेक्ष भी है। जो लोग इसे ईमानदारी से गा रहे हैं, गीत आज भी उनके साथ है और जो इसे महज एक शौक मानते हैं, गीत उनके साथ न पहले कभी रहा है और न आज है। गीत को किसी नुक्कड़ में सुना जाये या गलियों में, उसका अस्तित्व और अस्मिता कहीं से भी प्रभावित नहीं होती। बहरहाल, इस गीत परंपरा को समृध्द करते हुए उसे हिन्दी बहु-पठित और बहुचर्चित पत्र-पत्रिकाओं तक ले जाने का सद्कार्य छत्तीसगढ़ के गीतकारों में श्री दानेश्वर शर्मा, श्री विद्याभूषण मिश्र, श्री रामप्रताप सिंह 'विमल' और श्रीमती इंदिरा परमार के नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

भीड़ में ढ़ूंढ़ें कहां हम आज अपना पन,

बुझ चुका पूजा कलश संकोच में आंगन।

एक शबनम में झलकते हैं बहुत से रूप।

पहुंच पाई क्यों न मन तक प्रेम की वह धूप ?

आज कथनी और करनी में नहीं संयोग।

रूग्ण है परिवेश पूरा ग्रस चुका है रोग।

दिग्भ्रमित है आज कोलाहल विकल चिंतन।

23 दिसंबर सन् 1930 में पंडित कन्हैयालाल- बहुराबाई मिश्र के सुपुत्र के रूप में श्री विद्याभूषण मिश्र का जन्म एक संयोग नहीं बल्कि उस संस्कार का जन्म हुआ जिसे हम आज एक सर्वोत्कृष्ट गीतकार के नाम से जानते हैं। उनका संस्कारिक और शिक्षकीय जीवन उन्हें अपने पिता जी से विरासत में मिला था। जीवन में जैसे वे एक अच्छे शिक्षक के रूप में जाने गये वैसे ही वे एक अच्छे गीतकार के रूप में ख्याति अर्जित किये। उन्हें अपने पिता के अलावा शालेय गुरूदेव श्री सरयूप्रसाद त्रिपाठी 'मधुकर', महाविद्यालयीन प्राध्यापकों श्री आनंदीलाल पांडेय, डॉ. गजानन शर्मा, श्री पूनमचंद्र तिवारी एवं डॉ. राजेश्वर गुरू, का स्नेह मिला। इसलिए वे हमेशा उनके आदरणीय रहेंगे। श्री द्वारिकाप्रसाद तिवारी 'विप्र', एवं बाबू यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव ने उन्हें मंच एवं प्रकाशन की ओर अग्रसर मिया। श्रीकांत वर्मा उनके सहपाठी ही नहीं उनकी लेखनी के साक्षी रहे। डॉ. रामेश्वर शुक्ल 'अंचल', श्री बल्देवप्रसाद मिश्र, साहित्य वाचस्पति द्वय पंडित लोचनप्रसाद पांडेय और पंडित मुकुटधर पांडेय, श्री शेषनाथ शर्मा 'शील', श्री गुरूदेव काश्यप, पंडित जगदीश प्रसाद तिवारी, श्री रामअधीर, डॉ. विनय कुमार पाठक, श्री रामप्रताप सिंह 'विमल', श्री गौरीशंकर श्रीवास्तव, डॉ. प्यारेलाल गुप्त, श्री नारायणलाल परमार, श्री दौलतराम थवाईत आदि अनेक प्रभृति जनों के सत्संग में उनकी लेखनी को दिशा मिली और वह निरंतर प्रवाहित होती रही... आज 76 वर्ष की उम्र में भी वे लिख रहे हैं, यह हमारे लिए गौरव की बात है। मिश्र जी एक उत्कृष्ट गीतकार हैं। उनके सभी गीत गेय है। इसे वे सस्वर अपनी कक्षाओं में, कवि सम्मेलनों में और विचार गोष्ठियों में गा चुके हैं। आधा दर्जन से भी अधिक उनके कविता संग्रह प्रकाशित हो चुका है। गीत के बारे में उनका कथन है-'मेरे लिए गीत और जिंदगी एक दूसरे के अभिन्न हैं। मैं जीवन के प्रत्येक गतिवान क्षण को एक उत्सव की तरह मानते चलता हूं। प्रत्येक गीतकार जीवन के प्रत्येक पल के माधुर्य एवं तिक्त रस की बूंद बूंद को निचोड़कर उसे भोगने का अभिलाषी होता है। मैं यथार्थ की कड़ुवाहट और मौलिक कल्पनाओं के सलोनेपन को साहित्य की प्राणवान विधा गीत के सृजन स्रोत मानता हूं।' अपनी गीतों के बारे में वे कहते हैं-'मैंने अपनी गीतों में कल्पनाओं का सहारा लिया है क्योंकि कोमल कल्पनाएं गीत को हृदयग्राही बनाती हैं और गीतकार के मानसिक बिखराव को अनुशासनबध्दता प्रदान करती है।' देखिये उनके एक गीत :-

तेरा संयम हर अभाव के

द्वार दीप बन जाता।

तू संस्कृति का बन सुहाग

छंदों में गौरव पाता।

'संवर रही बासन्ती शाम' में उनकी अभिव्यक्ति की एक बानगी पेश है :-

फिसल रहे संयम के महकीले पांव।

ढ़ूंढ़ रहा प्यासा मन सपनीले गांव।

सुधियों की अमराई का नव श्रृंगार,

भावों के द्वार खोल गीत है खड़ा।


उन्होंने अपने प्रथम गीत संग्रह 'मन का वृंदावन जलता है' में उन्होंने युगीन चेतना के गीतों को प्राथमिकता दी है। दूसरे गीत संग्रह 'सुधियों के स्वर' में उन्होंने अपनी इंद्रधनुषी अनुभूतियों एवं सुरमीली सुधियों के गीतों को संग्रहित किया है। उनके चतुर्थ पुष्प के रूप में 'करूणांजलि' सन 1997 में प्रकाशित हुआ है। इस ग्रंथ के बारे में उनका मत है :-'भगवान श्रीराम जन जीवन के लिए दिव्य प्रेरणा के स्रोत हैं अत: अपने प्राण से नि:सृत प्रस्तुत 'करूणांजलि' उन्हीं के पद-पद्मों में समर्पित करते हुए मैं उनसे आज के भौतिकवादी परिवेश में आहत हृदयों के लिए शांति की याचना करता हूं।' वे गाते हैं :-

करूणा के कारण ही नारी सदा छली जाती है

कहीं अहल्या और कहीं बन सीता दुख पाती है।

तभी वे 'कुसुमांजलि' में गाते हैं :-

मौन अभिव्यक्ति को देवि तुम शक्ति दो

राम रस के बिना भाव रसहीन है।

राम ही साध्य हों छंद साधन रहें

राम करूणा बिना आचरण दीन है।

जांजगीर के कवि श्री शेषनाथ शर्मा 'शील' मिश्र जी के प्रेरणास्रोत रहे। बीच बीच में उन्हें उनसे प्रोत्साहन और दिशा निर्देश मिलता रहा है। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका स्नहाशीष उन्हें हमेशा मिलता रहेगा। शील जी करूणांजलि की भूमिका में लिखते हैं :-'वात्सल्य रस देने वाले इस महामहिम भक्तचित्त को शांति नहीं मिली और उसने एक नवीन रस का आनयन किया वह है 'राम भक्ति रस'। 'रामचति जे सुनत अघाहीं रस विशेष जाना तिन नाही।' इस नवीनतम और विशेष रस से तुलसी की रामायण रस भरता है। रामायत सम्प्रदाय के समस्त परवर्ती कवियों को भी इस विशेष रस ने आप्यायित किया। शिक्षा विभाग से निवृत्त होकर अब भी मिश्र जी प्राणपन से इस दिशा में श्रृजनात्मक प्रवृत्ति लेकर उतरे हैं। मुझे उनसे बड़ी आशाएं हैं। 'भूरि भाग भाजन भयेऊ तुम समेत बलि जाऊँ। जो तुम्हरे मन छाँड़ि छल कीन्ह राम पद ठाऊँ।'

इसी तर्ज में मिश्र जी ने 'श्रीराम भक्त हनुमान' काव्य संग्रह का प्रणयन किया है। सातवें पुष्प के रूप में वीर चूड़ावत और दानवीर कर्ण की गाथा को खंडकाव्य 'गूँजे वीरों का जयगान' में प्रकाशित किया है। सेनापति चूड़ावत तथा हाड़ारानी पर केंद्रित एवं दानवीर कर्ण की दानशीलता पर आधारित इस खंडकाव्य में शौर्य, त्याग, पराक्रम तथा श्रृंगार का अप्रतिम वर्णन हुआ है। कृति में श्रोता मन को आद्योपांत बांधे रखने की अपूर्व क्षमता दिखाई देती है। मिश्र जी ने इसमें मानों अपने काव्य कौशल को उँड़ेल दिया है। पूरा काव्य ओज, प्रसाद गुणों से लबालब है। अलंकारों का यथा स्थान सुन्दरतम प्रयोग हुआ है। इस काव्य कृति में भाव तथा कला दोनों ही बड़े सशक्त पक्ष हैं। एक बानगी पेश है :-

रहकर के निष्काम जगत में, कर्मरती पाता है मान।

भारत भूमि रहेगी जब तक, गूँजे वीरों का जयगान॥

सन् 1964 में चांपा के बालक उच्चतर माध्यमिक शाला में व्याख्याता रहते हुए यहां की साहित्यिक संस्था 'निराला साहित्य मंडल' के वे अध्यक्ष रहे। उन दिनों 'गीत वल्लरी' नामक खंडकाव्य प्रकाशित हुआ जिसकी भूमिका श्री रामेश्वर शुक्ल अंचल जी ने लिखी थी। उसी समय अंचल जी के पिता श्री मातादीन शुक्ल की 'मुण्डमाल' शीर्षक कहानी से प्रेरित होकर उन्होंने वीर चूड़ावत की रचना की थी। श्री गुरूदेव काश्यप ने दैनिक महाकोशल में धारावाहिक प्रकाशित किया। निराला साहित्य मंडल के अध्यक्ष रहते उन्होंने 'चांपा दर्शन' का प्रकाशन किया। इसमें उन्होंने चांपा और उसके आसपास के दर्शनीय स्थलों के बारे में आलेख लिखा जो आज हमारे लिए एक दस्तावेज है। वे एक उत्कृष्ट समीक्षक हैं। लगभग 200 पुस्तकों की समीक्षा उन्होंने लिखी है। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी साहित्य में उनका समान अधिकार है। वे अपने गीतों को हमेशा गाकर सुनाते हैं। उनकी प्राय: सभी रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं और आकाशवाणी के रायपुर, भोपाल, अम्बिकापुर से प्रसारित हो चुका है। विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से वे सम्मानित हो चुके हैं। उनके अभिन्न श्री रामअधीर ने भोपाल से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'संकल्प रथ' का एक अंक श्री विद्याभूषण मिश्र के उपर केंद्रित प्रकाशित की है जिसमें मिश्र जी की गीतों की विवेचना की गई है।

डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया ने 'गूँजे वीरों का जयगान' में लिखते हैं-'मिश्र जी की भाषा और छंद शिल्प पर अच्छा अधिकार है। प्राकृतिक सौंदर्य हो या वैचारिक प्रसंग, प्रेमालाप हो या युद्ध का क्षेत्र कवि ने सर्वत्र भावानुकूल भाषा का सुंदर और जीवंत प्रयोग किया है।' उन्होंने मिश्र जी की रचनाओं को विभिन्न पाठयक्रमों में रखने योग्य बताया है जो स्वागतेय है।

जांजगीर के एक छोटे से कमरे में मिश्र जी 76 वर्ष के होकर भी निरंतर लिख रहे हैं, और इस नगर को साहित्य गतिशीलता प्रदान कर रहे हैं। नवोदित रचनाकारों के लिए यह प्रेरणास्पद है। उनकी लेखनी हमेशा हमें प्रेरित करता रहे, वे स्वस्थ और शतायु हों... यही हमारी उनके प्रति कामना है। इति।

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रचना, आलेख, फोटो एवं प्रस्तुति :

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी,

चांपा-495671 (छ.ग.)

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